कोरोना लोकडाउन पर कविता

कोरोना की सच्चाई कविता के रूप में
कोरोना की सच्चाई कविता के रूप में
कोरोना लौकडाउन के चालते ,घर मे  खाली बैठे  जब मेने इस सामाजिक भागदौड से दूर खुद को पाया। और इस कोरोना बिमारी का एक नया दृष्टिकोण पाया। उसी को आपलोगों को मेरी कविता के माध्यम से बतने की कौशिश कर रहा हुँ।


  • कविता

गलियों का सन्नाटा कुछ इस तरह जिन्दगी बया कर रहा हैं।
बाहरी मौसम साधन मौत का , घर दवा बन रहा हैं।

उडान परिन्दों की आसमान तक मुखर है आज
आहट कदमों की आँगनो मे कैद हो गई।
कालचक़ ने ऐसा रूख मोडा वक्त का,
पडौसी की सांसे भी अब भेद हो गई।.

घर का कोना-कोना खिलखिलाती-सी हवा बन रहा हैं।
बाहरी मौसम साधन मौत का , घर दवा बन रहा हैं।

रिश्ते जो ख्वाबों की.तस्वीरों मे बंद थे,
हकीकत की मधुरता से सहज रहे हैं।
बाहरी चकाचौंध में बिखरे-बिखरे थे इंसा,
जों अब अपनो के फुलों से.महक रहे है।

हर आवाज की सदा कोई प्यारा-सा नगमा बन रहा हैं।
बाहरी मौसम साधन मौत का , घर दवा बन रहा हैं।

वो खेल जिनका अस्तित्व पुराना था,
रामायण भी लगती कोई गुजरा जमाना था,
जंग लगी जिन्दगी में जो नयेपन का दौर मिला है।
यूं लगता हैं यें रोग खुदा का ही कोई बहाना था।

आनन्द मन "नन्दिनी" मधुरता रसधारा बन रहा.हैं।
बाहरी मौसम साधन मौत का , घर दवा बन रहा हैं।
    
   कवि - रश्मिता ओझा "नन्दिनी"



मैं आशा करता हूं कि आप इस कोरोना  नाम की विकट परिस्थिति में सकुशल होंगे और अपने घर से बाहर ना निकल कर अपने देश का सहयोग कर रहे हो। सावधानी घर के अंदर भी जरूरी है जब भी बाहर से कोई सबजी या फल  लाएं तो उन्हें तुरंत उपयोग में ना ले। पहले उन्हें गर्म पानी में धोया जाए। खास तेवतिया चीते वर्क मुंह पर रूमाल रखें और ज्यादा भीड़भाड़ वाले इलाके में जाने से बचें। कोरोना से सावधानी ही सुरक्षा है। धन्यवाद

मैं आशा करता हूं कि आपको मेरी कविता पसंद आई होगी।

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